आइये आज हम शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji) के बारे में अध्ययन करेंगे
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शिवाजी (1627-1680 ई.)
जन्म | 20 अप्रैल 1627 |
जन्म स्थान | पूना(महाराष्ट्र)के समीप शिवनेर का पहाड़ी किला |
पिता | शाहजी भोंसले |
माता | जीजाबाई |
संरक्षक | दादा कोंडदेव |
शिक्षा | सैनिक शिक्षा, हिन्दू धर्मशास्त्रों की शिक्षा |
बाल्यावस्था में | रामायण, महाभारत तथा दूसरे हिन्दू शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान |
12 वर्ष की आयु में | पूना की जागीर प्राप्त हुई |
शिवाजी का बीजापुर के विरुद्ध सैन्य अभियान
शिवाजी के जीवनकाल का प्रथम सैन्य अभियान बीजापुर राज्य के विरुद्ध था । शिवाजी केसैन्य अभियान के समय बीजापुर का सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह था और में लम्बी बिमारी के कारण मृत्युशैया पर पड़ा था और इसी कारण उसका राज्य अस्त-व्यस्त दशा में था।
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मुरुम्बगढ़ दुर्ग (राजगढ़)
बीजापुर का सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह लम्बी बीमारी के कारण मृत्युशैया पर पड़ा था इसी समय शिवाजी ने सन 1646 ईस्वी में उसने बीजापुर राज्य के तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया।
शिवाजी को तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार से दो लाख हूण का खजाना मिला। शिवाजी ने इस धन-राशि से अपनी सेना का विस्तार किया और तोरण किले से पाँच मील पूर्व में मुरुम्बगढ़ के क्षत – विक्षित दुर्ग को नया रूप देकर उसे राजगढ़ नाम दिया।
शिवाजी द्वारा बीजापुर के प्रमुख मंत्रियों को रिश्वत(घूस) देकर अपनी तरफ मिला लिया तथा बीजापुर सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह अपनी कमजोर स्थिति के कारण शिवाजी के विरुद्ध इस समय कोई कार्यवाही नहीं कर सका।
शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से सुल्तान आदिलशाह भयभीत हो गया। यहाँ तक कि बीजापुर का कोई भी सेनापति शिवाजी के विरुद्ध अभियान के लिए तैयार नहीं हुआ।
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
अफजलखां
अफजलखां नामक सेनापति ने अंत में यह कहते हुए शिवाजी के विरुद्ध अभियान के लिए तैयार हुआ कि मैं अपने घोड़े से उतरे बिना शिवाजी को बंदी बनाकर ले आऊँगा ।
अफजलखां ने 1659 ई. में एक बड़ी सैना लेकर शिवाजी के विरुद्ध रवाना हुआ। अफजलखां ने छल का सहारा लेते हुए अपने दूत कृष्णजी भास्कर को भेजकर शिवाजी के सामने संधि वार्ता का प्रस्ताव रखा।
शिवाजी ने अफजलखां के छिपे हुए मन्तव्य को समझ लिया और सावधानी के साथ वार्ता के लिए अपनी स्वीकृति दे दी ।
शिवाजी निश्चित दिन वस्त्रों के नीचे कवच और लोहे की टोपी पहनकर अफजलखां से मिलने पहुँचे। अपने बायें हाथ में बाघनख और सीधी बाँह में बिछवा नामक तेज कटार छुपा रखे थे।
मुलाकात के दौरान अफलजखां ने शिवाजी को गले लगाते समय गर्दन दबोच कर तलवार से वध करने का प्रयास किया, परन्तु शिवाजी का कुछ नहीं बिगाड़ सका।
शिवाजी ने उसी समय बाघनख का प्रयोग कर अफजलखां को मार डाला। अफजलखां के मरते ही इधर-उधर जंगलों में छिपे हुए मराठा सैनिकों ने आक्रमण कर बीजापुर सेना को खदेड़ दिया।
शिवाजी द्वारा अफजलखां की हत्या करने पश्चात् शिवाजी की प्रतिष्ठा में अद्वितीय वृद्धि हुई । अफजलखां के बाद भी बीजापुर राज्य ने शिवाजी के विरुद्ध अनेक सैनिक अभियान भेजे परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ।
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शिवाजी और मुगल
औरंगजेब भी शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से चिंतित होने लगा । औरंगजेब ने शिवाजी पर नियंत्रण लिए अपने मामा शाइस्ताखां को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया ।
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
औरंगजेब का मामा शाइस्ताखां
शाइस्ताखां ने शीघ्र ही पूना पर अधिकार कर लिया और वहीं से शिवाजी के विरुद्ध कार्यवाही का संचालन करने लगा।
शाइस्ताखां पूना के उसी महल में ठहरा हुआ था जहाँ पर शिवाजी ने अपना बचपन बिताया था। शिवाजी लगभग 400 सैनिकों के साथ 15 अप्रैल 1663 की शाम पूना महल पहुँचे।
जब शिवाजी शाइस्ताखां के निवास स्थान के पास पहुँचे तो मुगल रक्षकों ने उन्हें टोका। शिवाजी ने उन्हें यह कहकर बेपरवाह कर दिया कि वे मुगल सेना के ही मराठे सैनिक (Soldier) हैं और अपने-अपने स्थान(Place) पर जा रहे हैं।
शिवाजी ने अर्द्धरात्रि के समय अपने सैनिकों के साथ शाइस्ताखां के डेरे पर मार-काट आरम्भ कर दी।
इस मार-काट से शाइस्ताखां की एक उँगली कट गई परन्तु और वह रात्रि के अंधकार का फायदा उठाकर भागने में सफल रहा।
शाइस्ताखां का एक पुत्र और छः पत्नियों सहित अनेक मुगल सैनिक इस अभियान में मारे गए।
औरंगजेब को जब इस अभियान की जानकारी मिली तो उसके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। औरंगजेब ने शाइस्ताखां को उसकी असफलता का दण्ड देने के प्रयोजन से बंगाल भेज दिया।
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
शाहजादा मुअज्जम और मारवाड़ के जसवंतसिंह
औरंगजेब ने शाइस्ताखां के बाद शिवाजी पर नियंत्रण के लिए शाहजादा मुअज्जम और मारवाड़ के जसवंतसिंह को भेजा, परन्तु ये दोनों भी शिवाजी पर नियंत्रण करने के उद्देश्य में सफल नहीं हुये।
शाहजादा मुअज्जम और मारवाड़ के जसवंतसिंह की नाकामी के कारण शिवाजी का साहस और बढ़ा गया, मुगल प्रदेशों में शिवाजी निडर होकर लूटमार करने लगा।
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सूरत
शिवाजी ने जनवरी 1664 ई. में सूरत के समृद्ध नगर को लूट लिया। शिवाजी को इस लूट से एक करोड़ रुपये के आभूषण, रत्न आदि हाथ लगे।
मिर्जाराजा जयसिंह
शिवाजी पर नियंत्रण के लिए अब औरंगजेब ने आमेर के कुशल राज-नीति-कुशल मिर्जाराजा जयसिंह के साथ सेनानायक ताजखां और दिलेरखां को भेजा।
मिर्जाराजा जयसिंह ने कहा था कि “हम उसे वृत के घेरे की तरह बांध लेंगे।” राज-नीति-कुशल जयसिंह ने शिवाजी के विरोधियों को ही नहीं अपितु प्रलोभन देकर अनेक मराठों को भी अपने पक्ष में कर लिया।
पुरन्दर की संधि
मिर्जाराजा जयसिंह ने मराठा राज्य पर आक्रमण करते हुए शिवाजी को पुरन्दर के किले में घेर लिया। शिवाजी को विवश होकर 11 जून 1665 ई. को मिर्जा राजा जयसिंह के साथ पुरन्दर की संधि (समझौता) करनी पड़ी।
शिवाजी ने इस संधि के अनुसार अपने 23 दुर्ग मुगलों के हवाले कर दिये और बीजापुर के विरुद्ध मुगलों को आवश्यकता पड़ने पर सहायता करने का आश्वासन दिया।
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
फ्रांसीसी यात्री बर्नियर
पुरन्दर की संधि के अनुसार शिवाजी को व्यक्तिगत रूप से मुग़ल दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया गया। इस संधि के समय फ्रांसीसी यात्री बर्नियर भी मौजूद था।
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शिवाजी का आगरा प्रस्थान
शिवाजी के साथ पुरन्दर की संधि की धाराओं में स्पष्ट ज़िक्र था कि शिवाजी को मुग़ल दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा। परन्तु इसके बावजूद मिर्जाराजा जयसिंह ने शिवाजी को आगरा चलने के लिए मना लिया।
शिवाजी ने मिर्जाराजा जयसिंह के साथ आगरा चलने के लिये सहमति इस लिये दे दी, कि शिवाजी द्वारा मुगल दरबार से सम्पर्क बनाना और उत्तरी भारत की राजनितिक स्थिति को जानने के लिए एक अच्छा मौका मिल रहा था।
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शिवाजी की उपेक्षा
शिवाजी आगरा के मुगल दरबार में मई 1666 ई. में उपस्थित हुए। मुगल दरबार में औरंगजेब द्वारा शिवाजी को उचित सम्मान न देकर उनके प्रति अशिष्ट व्यवहार किया और मनसबदारों की तृतीय पंक्ति में खड़ा कर दिया।
शिवाजी ने देखा कि मारवाड़ के जसवंतसिंह उनके सामने खड़ा है तो दुःखी होकर शिवाजी ने कहा ‘जिस जसवंतसिंह की पीठ मेरे सैनिकों ने देखी थी, मुझे उसके पीछे खड़ा होना पड़ रहा है।”
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
शिवाजी को जयपुर भवन में बंदी बनाना
शिवाजी को मुग़ल दरबार में सम्मानजनक व्यवहार न मिलने से नाराज शिवाजी मुग़ल दरबार से रामसिंह (मिर्जाराजा जयसिंह का पुत्र) के निवास पर लौट आये। इसी बीच औरंगजेब ने शिवाजी को जयपुर भवन में बंदी बना लिया और मार डालने का निश्चय किया।
शिवाजी का बंदीगृह से बचकर निकलना
शिवाजी को जयपुर भवन में बंदी बनाये जाने पर इस गंभीर स्थिति में भी शिवाजी ने अपनी हिम्मत नहीं खोई और मुगलों की पकड़ से बच निकलने का उपाय खोजने लगे।
शिवाजी ने बीमार होने का बहाना बनाकर और हिंदू परंपरा के अनुसार दीन-दुःखियों को मिठाई, फल आदि दान देना आरम्भ कर दिया।
प्रत्येक दिन बंदीगृह में मिठाई और फलों के टोकरे आने लगे दीन-दुःखियों को मिठाई, फल आदि दान देने के लिए । शुरूआत में तो पहरेदार टोकरों की गहन छानबीन करते थे परन्तु कुछ समय बाद में काफी बेपरवाह हो गए।
शिवाजी उचित समय देखकर अपने पुत्र शम्भाजी के साथ इन फलों के टोकरों में बैठकर औरंगजेब की क़ैद से निकल कर महाराष्ट्र पहुँच गए।
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शिवाजी का स्वास्थ्य खराब होना
शिवाजी के बंदी जीवन व कठिन यात्रा के कारण शिवाजी का स्वास्थ्य गिर गया। उधर नया मुगल सूबेदार मुअज्जम आरामतलब आदमी था और उसका सहयोगी जसवंतसिंह शिवाजी से सहानुभूति रखता था।
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मुगल-मराठा संधि
मुगल औरशिवाजी दोनों पक्ष इस समय युद्ध विराम चाहते थे। जसवंतसिंह की मध्यस्थता से 1667 ई. में मुगल-मराठा संधि संपन्न हुई इस के अनुसार औरंगजेब ने शिवाजी को स्वतन्त्र शासक स्वीकार कर ‘राजा’ की उपाधि को मान्यता दे दी।
औरंगजेब शिवाजी के संधि हो जाने के बावजूद, औरंगजेब शिवाजी के विरुद्ध चाल चलने से बाज नहीं आया। शिवाजी ने इस कारण 1670 ई. में सूरत को दोबारा लूट लिया और अपने खोये हुए प्रदेशों पर अधिकार करना प्रारम्भ कर दिया।
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
शिवाजी का राज्याभिषेक
शिवाजी ने बनारस के गंगाभट्ट नामक ब्राह्मण को बुलाकर जून 1674 ई. को राजधानी रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक करवाया और ‘छत्रपति’, ‘हिन्दू धर्मोद्धारक’, ‘गौ ब्राह्मण प्रतिपालक’ आदि उपाधियाँ धारण की।
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शिवाजी का मूल्याकन
शिवाजी ने देश के लोगों में नवजीवन का संचार करने तथा स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना के उद्देश्य से आजीवन संघर्षरत रहे। एक बड़ी सीमा तक वे अपने उद्देश्य में सफल रहे।
मुगलों से युद्ध करते समय शिवाजी ने राजपूत राजाओं से संघर्ष के स्थान पर मेलजोल की नीति अपनाई ।
शिवाजी के आगरा जाने का उद्देश्य अपनी आँखों से उत्तरी भारत की दशा देखकर यह जानना था कि क्या उत्तरी भारत मुगल साम्राज्य के पंजे से मुक्त होने के लिए तैयार है?
मराठा जननायक ‘शिवाजी’ की स्मृति में लोकमान्य(Lokmanya) बाल गंगाधर तिलक द्वारा 1895 ई. में प्रारम्भ किया गया ‘शिवाजी उत्सव’ काफी प्रसिद्ध रहा।
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सर जदूनाथ सरकार
सर जदूनाथ सरकार के अनुसार शिवाजी हिन्दू प्रजाति का अंतिम प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति और राष्ट्र निर्माता शासक था जिस समय वह महाराष्ट्र के रंगमंच पर आये, उस समय मराठे विदेशी शासकों के अधीन दक्षिण में सर्वत्र बिखरे हुए थे।
शिवाजी ने उन्हें संगठित कर सिद्ध कर दिया कि वे एक राज्य की स्थापना ही नहीं अपितु एक राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। मुगलों का कड़ा प्रतिरोध कर उन्होंने मराठा स्वराज्य की स्थापना की।
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शिवाजी की धार्मिक नीति
विद्वान ब्राह्मणों को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने एक पृथक धनराशि की व्यवस्था की थी आग्रही हिन्दू होने के कारण शिवाजी एक धर्म-सहिष्णु शासक थे।
शिवाजी ने अपनी मुस्लिम प्रजा को विचार और नमाज की पूरी स्वतन्त्रता दे रखी थी तथा मुसलमान फकीर व पीरों को समान रूप से आर्थिक सहायता प्रदान की।
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
केलोशी के बाबा याकूत
शिवाजी ने केलोशी के बाबा याकूत के लिए आश्रम बनवाया। युद्ध अभियानों के समय उनके सैनिकों के हाथ अगर कुरान लग जाती थी तो वे उसे अपने मुस्लिम साथियों को पढ़ने के लिए दे देते थे।
मुस्लिम इतिहासकार खाफीखां
मुस्लिम इतिहासकार खाफीखां ने शिवाजी की धर्म-सहिष्णुता व हमले में मिली हुई मुस्लिम महिलाओं व बच्चों के प्रति किए गये सम्मानजनक व्यवहार की प्रशंसा की है।
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मुल्ला अहमद नवायत
कल्याण के बीजापुरी गवर्नर मुल्ला अहमद नवायत की सुन्दर पुत्रवधू को मराठा सेना ने लूट के साथ शिवाजी को भेंट करना चाहा था किन्तु शिवाजी ने उसे वस्त्राभूषण सहित ससम्मान बीजापुर वापिस भिजवा दिया।
शिवाजी ने राज्य सेवा में भी धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया और मुसलमानों को सेना तथा जहाजी बेड़े में विश्वसनीय पदों पर नियुक्त किया।
इतिहासकार सरदेसाई
इतिहासकार सरदेसाई के अनुसार शिवाजी महाराष्ट्र तक सीमित न रहकर भारत में स्वराज्य की स्थापना करना चाहते थे।
दादाजी नरसप्रभु
शिवाजी ने 1645 ई. के आरम्भ में दादाजी नरसप्रभु को ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की योजना के सम्बन्ध में लिखा था जिससे उनका अभिप्राय सम्पूर्ण भारत के हिन्दूओं को धार्मिक स्वतन्त्रता दिलाना था। विचारशील व क्रियाशील मराठों ने उनके विचारों को इसी संदर्भ में समझा।
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शिवाजी (1627-1680 ई.)(Shivaji)
शिवाजी की मृत्यु
शिवाजी के अंतिम दिन चिंता में बीते एक तरफ तो वे अपने पुत्र शम्भाजी के मुगलों की शरण में जाने से दुःखी थे, दूसरी तरफ उनकी पत्नी सोयराबाई अपने पुत्र राजाराम को उत्तराधिकारी(Successor) बनाने के लिए षड्यंत्र(conspiracy) रच रही थी। इन परिस्थितियों में अप्रैल 1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु हो गई।
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