History of Chauhans in Rajasthan
विग्रहराज द्वितीय
प्रारंभिक चौहान शासकों में सबसे प्रतापी शासक सिंहराज का पुत्र विग्रहराज द्वितीय हुआ, जो 965 ई. के आसपास सपादलक्ष (संभार) का राजा बना। भडाँच में अपनी कुल देवी आशापुरा माता के मंदिर का निर्माण करवाया । 973 ई. के हर्षनाथ के अभिलेख से विग्रहराज के शासन काल के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है
पृथ्वीराज प्रथम
विग्रहराज तृतीय के पुत्र पृथ्वीराज प्रथम ने 1105 ई. में 700 चालुक्यों को जो पुष्कर के ब्राह्मणों को लूटने आये थे, मौत के घाट उतारा व ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की
अजयराज
अजयराज चौहान ,चौहान वंश के प्रतापी शासक थे पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज के काल को गोपीनाथ शर्मा चौहानों के साम्राज्य का निर्माण काल मानते हैं। अजयराज ने मालवा के परमार शासक नरवर्मन को परास्त कर उसके सेनापति सुल्हण को बंदी बना लिया। अजयराज ने अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए उसने 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। उसने अजयमेरु में एक दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे गढ़बीटली कहते हैं। यह तारागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने ‘श्री अजयदेव नाम से चाँदी के सिक्के चलाये। कुछ मुद्राओं पर उसकी रानी सोमलेखा (सोमलवती) का नाम भी अंकित मिलता है। पृथ्वीराज विजय के अनुसार उसने गजनी के मुसलमानों को परास्त कर साम्राज्य की रक्षा की। अपने पुत्र अर्णोराज को राज्य सौंपकर वह पुष्कराध्य चला गया।
अर्णोराज (1133-1155 ई.)
अजयराज के बाद अर्णोराज ने 1133 ई. के लगभग अजमेर का शासन संभाला। इसने महाराजाधिराज, परमेश्वर, परमभट्टारक की उपाधि धारण की अर्णोराज ने तुर्क आक्रमणकारियों को खदेड़ा और मालवा के नरवर्मन को पराजित किया। अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया। चालुक्य शासक कुमारपाल ने आबू के निकट युद्ध में अर्णोराज को हराया।
इस युद्ध का वर्णन प्रबन्ध चिन्तामणि एवं प्रबन्ध कोश में मिलता है। अर्णोराज एवं चालुक्य जयसिंह सिद्धराज के मध्य वैमनस्य था। जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचन देवी का विवाह अर्णोराज से करके मधुर संबंध बनाये।
अर्णोराज शैव मत को मानने वाला हो कर भी पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया अर्णोराज ने अजमेर में खरतरगच्छ के अनुयायियों के लिए भूमिदान दिया। ‘देवबोध’ और ‘धर्मघोष’ उसके समय के प्रकाण्ड विद्वान थे जिनको उसने सम्मानित किया था। उसके पुत्र जग्गदेव ने उसकी हत्या कर दी।
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विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव चौहान) (1158-1163 ई.)
विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) 1158 ई. के लगभग अजमेर का शासक बना। विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) चौहान वंश का प्रतापी शासक था शिवालिक अभिलेख के अनुसार इसने अपने राज्य की सीमाओं का अत्यधिक विस्तार किया। उसने गजनी के शासक अमीर खुशरुशाह (हम्मीर) व दिल्ली के तोमर शासक तंवर को परास्त किया एवं दिल्ली को अपने राज्य में मिलाया।
चालुक्य शासक कुमारपाल से पाली, नागौर व जालौर छीन लिये तथा भडणकों को भी पराजित किया।
विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) साहित्य प्रेमी व साहित्यकारों का आश्रयदाता भी था। उसके दरबार में सोमदेव जो बीसलदेव का राजकवि था, ने ‘ललित विग्रहराज’ नाटक की रचना की। इसमें इन्द्रपुर की राजकुमारी देसल देवी व बीसलदेव का प्रेम प्रसंग का वर्णन है। विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण जयनायक भट्ट ने विग्रहराज को कवि बान्धव” (कवि बंधु) उपादी प्रादन की, विग्रहराज स्वयं ने हरिकेली नाटक की रचना की।
विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) ने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया (अढ़ाई दिन के झोपडं की सीढ़ियों में मिले दो पाषाण अभिलेखों के अनुसार) जिसे कालांतर में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्र्दीन ऐबक ने ढाई दिन के झोंपड़े में परिवर्तित कर दिया।
वर्तमान टोंक जिले में बीसलपुर गाँव एवं बीसलपुर बाँध का निर्माण भी बीसलदेव द्वारा करवाया गया।
दिल्ली शिवालिक अभिलेख से ज्ञात होता है कि विग्रहराज चतुर्थ ने म्लेच्छों को बार-बार पराजित किया और भारत देश से निकल दिया। बीसलदेव चौहान के राजकाल/शासन काल को चौहानों का स्वर्णयुग भी कहा जाता है।
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पृथ्वीराज द्वितीय
विग्रहराज चतुर्थ के बाद अपरगांगेय और उसके बाद पृथ्वीराज द्वितीय गद्दी पर बैठा जिसने 1169 ई. तक शासन किया। पृथ्वीराज द्वितीय ने राज्य को मुसलमानों से बचाया और पूरी तरह से नियंत्रण रखा।
विग्रहराज द्वितीय चौहान वंश
सोमेश्वर
पृथ्वीराज द्वितीय की निःसंतान मुत्यु होने पर उसका चाचा सोमेश्वर ने अजमेर का सिंहासन प्राप्त किया। सोमेश्वर चौहान अजमेर के शासक अर्णोराज चौहान का सबसे छोटा पुत्र था। सोमेश्वर चौहान की माता गुजरात की राजकुमारी कांचन देवी से उत्पन्न हुआ था। सोमेश्वर का लालन-पालन उसके ननिहाल गुजरात में हुआ था। कुमारपाल ने सोमेश्वर की पर्याप्त देखभाल की। कुमारपाल ने सोमेश्वर का विवाह कलचुरी (त्रिपुरी) नरेश अचल की राजकुमारी कर्पुरदेवी से करवा दिया था। कर्पुरदेवी से उसके पृथ्वीराज तृतीय और हरिराज नामक दो पुत्र हुए।
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